24 Nov 2009

आम आदमी की आवाज दब गई !!

लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट लीक हुई फिर उसे संसद में पेश भी किया गया. खूब शोर शराबा भी हुआ . २४ घंटे ताजा खबर देने वाली मीडिया में भी दो दिनों तक छाई रही पर इस हो-हल्ला में हम आम लोगो की आवाज तो दब ही गई. हमारे महंगाई के मुद्दे, किसानो के लिए समर्थन मूल्य की बात, और ऐसी कई तमाम मुद्दे जो आम लोगों की हीतो से सम्बंधित थे वे सब कही बाबरी मुद्दा रूपी बादलों के पीछे चले गए. मेरा मानना है की आम आदमी सिर्फ आम आदमी होता है.उसे तो पहले रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मुलभुत जरूरतें पूरी करनी होती हैं. यदि सड़क पे खड़े एक भूखे व्यक्ति से पूछा जाये की उसे क्या चाहिए तो वो मंदिर या मस्जिद नहीं खाना मांगेगा. एक आम मध्यम वर्गीय परिवार अपने घर की सुरक्षा, महंगाई पे लगाम, बिजली, सड़क, बेहतर शिक्षा और बेहतर शहरी व्यवस्था चाहता है न की जो हमारे नेता सोचते हैं. काश हमारे नेता मुद्दों को वरीयता जनता को ध्यान में रख कर देना सीख जाते बनिस्पत की अपने और अपने पार्टी के.
आखिर में वो ग़ालिब की बात भी याद आती है " आदमी को आदमी मय्यसर कहाँ"
जय हिंद !!

21 Nov 2009

मेरी पहली बात....

मैं जब स्कूल में था तब ऐसा लगता था जैसे सब कुछ बहुत आसान है पर धीरे धीरे ये एहसास हुआ की जिंदगी यु ही नहीं मिलती. इसके होने के कई मायने हैं. मैं भी उन्ही की तलाश में हूँ . भारत में जहाँ ६० फीसदी आबादी गाँव में रहती है वहा जिंदगी अलग ही दिखती है. हर दिन सुबह से लेकर शाम तक जीतोड़ मेहनत करना और फिर अगले दिन के लिए सोचना. आम जनता भारत में खुद अपने दम पर और ईश्वर के भरोसे जीवित है. कोई किसी की सुध नहीं लेता. जिनपर आम जनता की सुरक्षा और खुशहाली की जिम्मेदारी है वे भी अपना ही उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं . क्या होगा कोई नहीं जनता. किसानो को अपनी बात रखने के लिए राजधानी में प्रदर्शन करना पड़ता है तब जा कर किसी के कान तक आवाज जा पाती है. ये तो खैर देश के किसानो की बात है. मध्यम वर्गीय शहरी लोगो की हालत तो और भी दयनीय है . छोटी सी आमदनी में पहाड़ सी जरूरते भला कैसे समाये . ऊपर से आसमान छूती महंगाई. खाने के सामान के दाम तो बाद रहे हैं लेकिन मोबाइल, कार, फ्रीज, और कंप्यूटर आदि तमाम ऐसी चीजो के दम घाट रहे हैं. क्या आम जनता के लिए इनका दाम घटना जरुरी है या फिर पेट भरने के लिए रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओ का. अभी भी देश में भीषण गरीबी है . लोगों को दो वक़्त की रोटी जुटानी मुस्किल होती है . ऐसे में क्या वे इस महंगाई को झेल पाएँगे? हमारे देश में पैसा है पर मात्र १० प्रतिसत लोग देश के ९० प्रतिसत धन और सुविधा का उपभोग कर रहे है. क्या यही गाँधी जी के सर्वोदय का सपना था ?