Take It Easy
Don't make the life too complex and calculative...
20 Nov 2015
4 Jan 2015
29 Dec 2011
जीवन की आपा-धापी में कब वक़्त मिला
जीवन की आपा-धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमे क्या बुरा भला
मैं जितना ही भूलूं भटकूँ या भारमाऊं
है एक कही मंजिल जो मुझे बुलाती है
कितने ही मेरे पांव पड़े ऊँचे नीचे
प्रति पल वो मेरे पास चली ही आती है
जीवन की आपा-धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमे क्या बुरा भला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमे क्या बुरा भला
मैं जितना ही भूलूं भटकूँ या भारमाऊं
है एक कही मंजिल जो मुझे बुलाती है
कितने ही मेरे पांव पड़े ऊँचे नीचे
प्रति पल वो मेरे पास चली ही आती है
जीवन की आपा-धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमे क्या बुरा भला
हरिवंशराय बच्चन जी कि लिखी कविता की उपरोक्त लाइने बड़ी ही दार्शनिक और सटीक हैं . न जाने क्यों हर मनुष्य कि यही दशा है . हमें खुद नहीं पता होता कि हमें जाना कहाँ है? एक की अभिलाषा पुरी होते ही दुसरी पनप जाती है और फिर हम उसके पीछे हो लेते हैं . कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है जैसे बजाये इसके कि हम दौड़ रहे हैं
शायद हमारे पैरों के नीचे की जमीन ही उलटी दिशा में भाग रही हो ! हो सकता है मेरी बातें निराशावादी लगे पर इसका दूसरा पहलु भी है . वो ये की जहा हमें जाना है वहां तो हम जायेंगे ही तो फिर डर कर, संकित हो कर और फल कि चिंता करते हुए क्यों कोई कार्य करे ? क्यों न आत्मविश्वास के साथ जीवन के पथ पर आगे बड़े .
यह पंक्ति भी तो कुछ ऐसा ही कहती है -"एक राह तू पकड़ चला चल पा जायेगा मधुशाला " .
और फिर भगवद गीता में भी तो यही है " कर्मंयेवाधिकरास्ते माँ फलेषु कदाचन " .
यदि मैं गलत नहीं हूँ तो हर मनुष्य उपरोक्त पंक्तियों में अपने आप को मौजूद पायेगा .
24 Nov 2009
आम आदमी की आवाज दब गई !!
लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट लीक हुई फिर उसे संसद में पेश भी किया गया. खूब शोर शराबा भी हुआ . २४ घंटे ताजा खबर देने वाली मीडिया में भी दो दिनों तक छाई रही पर इस हो-हल्ला में हम आम लोगो की आवाज तो दब ही गई. हमारे महंगाई के मुद्दे, किसानो के लिए समर्थन मूल्य की बात, और ऐसी कई तमाम मुद्दे जो आम लोगों की हीतो से सम्बंधित थे वे सब कही बाबरी मुद्दा रूपी बादलों के पीछे चले गए. मेरा मानना है की आम आदमी सिर्फ आम आदमी होता है.उसे तो पहले रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मुलभुत जरूरतें पूरी करनी होती हैं. यदि सड़क पे खड़े एक भूखे व्यक्ति से पूछा जाये की उसे क्या चाहिए तो वो मंदिर या मस्जिद नहीं खाना मांगेगा. एक आम मध्यम वर्गीय परिवार अपने घर की सुरक्षा, महंगाई पे लगाम, बिजली, सड़क, बेहतर शिक्षा और बेहतर शहरी व्यवस्था चाहता है न की जो हमारे नेता सोचते हैं. काश हमारे नेता मुद्दों को वरीयता जनता को ध्यान में रख कर देना सीख जाते बनिस्पत की अपने और अपने पार्टी के.
आखिर में वो ग़ालिब की बात भी याद आती है " आदमी को आदमी मय्यसर कहाँ"
जय हिंद !!
आखिर में वो ग़ालिब की बात भी याद आती है " आदमी को आदमी मय्यसर कहाँ"
जय हिंद !!
21 Nov 2009
मेरी पहली बात....
मैं जब स्कूल में था तब ऐसा लगता था जैसे सब कुछ बहुत आसान है पर धीरे धीरे ये एहसास हुआ की जिंदगी यु ही नहीं मिलती. इसके होने के कई मायने हैं. मैं भी उन्ही की तलाश में हूँ . भारत में जहाँ ६० फीसदी आबादी गाँव में रहती है वहा जिंदगी अलग ही दिखती है. हर दिन सुबह से लेकर शाम तक जीतोड़ मेहनत करना और फिर अगले दिन के लिए सोचना. आम जनता भारत में खुद अपने दम पर और ईश्वर के भरोसे जीवित है. कोई किसी की सुध नहीं लेता. जिनपर आम जनता की सुरक्षा और खुशहाली की जिम्मेदारी है वे भी अपना ही उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं . क्या होगा कोई नहीं जनता. किसानो को अपनी बात रखने के लिए राजधानी में प्रदर्शन करना पड़ता है तब जा कर किसी के कान तक आवाज जा पाती है. ये तो खैर देश के किसानो की बात है. मध्यम वर्गीय शहरी लोगो की हालत तो और भी दयनीय है . छोटी सी आमदनी में पहाड़ सी जरूरते भला कैसे समाये . ऊपर से आसमान छूती महंगाई. खाने के सामान के दाम तो बाद रहे हैं लेकिन मोबाइल, कार, फ्रीज, और कंप्यूटर आदि तमाम ऐसी चीजो के दम घाट रहे हैं. क्या आम जनता के लिए इनका दाम घटना जरुरी है या फिर पेट भरने के लिए रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओ का. अभी भी देश में भीषण गरीबी है . लोगों को दो वक़्त की रोटी जुटानी मुस्किल होती है . ऐसे में क्या वे इस महंगाई को झेल पाएँगे? हमारे देश में पैसा है पर मात्र १० प्रतिसत लोग देश के ९० प्रतिसत धन और सुविधा का उपभोग कर रहे है. क्या यही गाँधी जी के सर्वोदय का सपना था ?
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