29 Dec 2011

जीवन की आपा-धापी में कब वक़्त मिला

जीवन की आपा-धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमे क्या बुरा भला

मैं जितना ही भूलूं भटकूँ या भारमाऊं
है एक कही मंजिल जो मुझे बुलाती है
कितने ही मेरे पांव पड़े ऊँचे नीचे
प्रति पल वो मेरे पास चली ही आती है

जीवन की आपा-धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमे क्या बुरा भला


हरिवंशराय बच्चन जी कि लिखी कविता की उपरोक्त लाइने बड़ी ही दार्शनिक और सटीक हैं . न जाने क्यों हर मनुष्य कि यही दशा है . हमें खुद नहीं पता होता कि हमें जाना कहाँ है? एक की अभिलाषा पुरी होते ही दुसरी पनप जाती है और फिर हम उसके पीछे हो लेते हैं . कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है जैसे बजाये इसके कि हम दौड़ रहे हैं
शायद हमारे पैरों के नीचे की जमीन ही उलटी दिशा में भाग रही हो ! हो सकता है मेरी बातें निराशावादी लगे पर इसका दूसरा पहलु भी है . वो ये की जहा हमें जाना है वहां तो हम जायेंगे ही तो फिर डर कर, संकित हो कर और फल कि चिंता करते हुए क्यों कोई कार्य करे ? क्यों न आत्मविश्वास के साथ जीवन के पथ पर आगे बड़े .
यह पंक्ति भी तो कुछ ऐसा ही कहती है -"एक राह तू पकड़ चला चल पा जायेगा मधुशाला " .
और फिर भगवद गीता में भी तो यही है " कर्मंयेवाधिकरास्ते माँ फलेषु कदाचन " .
यदि मैं गलत नहीं हूँ तो हर मनुष्य उपरोक्त पंक्तियों में अपने आप को मौजूद पायेगा .